गिर राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य दक्षिणी सौराष्ट्र की पहाड़ियों में 1,400 वर्ग किलोमीटर से कुछ ज़्यादा के सूखे पर्णपाती जंगल, कँटीली झाड़ियों और घास के मैदानों में फैला है, जिसमें से केंद्र का लगभग 258 वर्ग किलोमीटर राष्ट्रीय उद्यान है। यह एशियाई शेर, Panthera leo persica, का आख़िरी गढ़ है — और अब, बढ़ते-बढ़ते, शेरों के उस कहीं बड़े भू-दृश्य का दिल जो खेतों और तट तक फैल गया है।
गिर एक नज़र में
- कहाँ: गुजरात के जूनागढ़, गिर सोमनाथ और अमरेली ज़िले। सफ़ारी सासण गिर से शुरू होती हैं।
- मौसम: आम तौर पर 16 अक्टूबर से 15 जून। मानसून में बंद।
- सफ़ारी: गिर जंगल ट्रेल (खुली जिप्सी, क़रीब तीन घंटे, दिन में तीन स्लॉट) और देवळिया सफ़ारी पार्क (बस या जिप्सी, एक घंटे से कम)।
- परमिट: सिर्फ़ ऑनलाइन, गुजरात वन विभाग से।
- शेर: वन विभाग के 2025 के आबादी अनुमान में 891, जो 2020 के 674 से ज़्यादा है; ये गिर और आसपास के ज़िलों में फैले हैं।
गिर जंगल ट्रेल सफ़ारी कैसे चलती है
जंगल ट्रेल अभयारण्य के पर्यटन ज़ोन में एक खुली, पंजीकृत जिप्सी में ड्राइव है, जिसमें ड्राइवर और वन विभाग का गाइड साथ होते हैं। एक परमिट पर छह आगंतुकों तक का एक वाहन जाता है; मौजूदा नियमों के तहत एक छोटे बच्चे को अतिरिक्त अनुमति मिल सकती है। आम तौर पर दिन में तीन स्लॉट होते हैं — एक सूर्योदय के आसपास से, एक देर सुबह और एक दोपहर बाद — हर एक क़रीब तीन घंटे का, और सर्दी व गर्मी के बीच समय में थोड़ा बदलाव किया जाता है।
आप यह नहीं चुनते कि कहाँ जाएँगे। जंगल कई क्रमांकित रूटों में बँटा है, और आपके वाहन को सासण में सिंह सदन के रिसेप्शन केंद्र पर एक रूट आवंटित होता है। कुछ रूट कमलेश्वर बाँध से गुज़रते हैं; सभी शेरों के अच्छे इलाक़े से होकर जाते हैं। वन विभाग के ट्रैकर शेरों की आवाजाही पर सामान्य नज़र रखते हैं, जो इस बात की एक वजह है कि शेर अक्सर दिखते हैं — पर इसकी गारंटी कभी नहीं होती।
परमिट की बुकिंग, क़दम-दर-क़दम
- girlion.gujarat.gov.in पर जाइए — और कहीं नहीं — और “Gir Jungle Trail” या “Devalia Safari Park” चुनिए।
- तारीख़ और स्लॉट चुनिए। बुकिंग एक तय अवधि पहले खुलती है और लोकप्रिय तारीख़ें जल्दी भर जाती हैं।
- हर आगंतुक का नाम, उम्र और फ़ोटो पहचान-पत्र का ब्योरा ठीक वैसा ही भरिए जैसा उस दस्तावेज़ पर है जो वे साथ लाएँगे। विदेशी नागरिक अपना पासपोर्ट इस्तेमाल करते हैं।
- ऑनलाइन भुगतान कीजिए और ई-परमिट सहेज लीजिए।
- उस दिन परमिट और मूल पहचान-पत्रों के साथ समय रहते सिंह सदन पहुँचिए। जिप्सी और गाइड वहीं दिए जाते हैं और उनका भुगतान अलग से होता है।
ख़र्च कितना आता है
तीन अलग-अलग शुल्क हैं: प्रति वाहन परमिट शुल्क (विदेशी नागरिकों के लिए भारतीयों से ज़्यादा, और सप्ताहांत व सार्वजनिक छुट्टियों पर ज़्यादा), जिप्सी का किराया, और गाइड की फ़ीस। कुछ उपकरणों पर कैमरा शुल्क भी लग सकता है। वन विभाग इन्हें समय-समय पर बदलता है, इसलिए हम जान-बूझकर ऐसे आँकड़े नहीं छापते जो पुराने पड़ सकते हैं — बजट बनाने से पहले मौजूदा दरें पोर्टल पर देखिए। मोटे अंदाज़ के लिए: पूरी जिप्सी साझा करने वाले भारतीय आगंतुकों को जंगल ट्रेल प्रति व्यक्ति सस्ता पड़ता है; विदेशी आगंतुकों के लिए परमिट कई गुना महँगा है।
जंगल ट्रेल या देवळिया?
| गिर जंगल ट्रेल | देवळिया सफ़ारी पार्क | |
|---|---|---|
| यह क्या है | खुले, जंगली वन से होकर ड्राइव | प्राकृतिक परिवेश का बाड़बंद इंटरप्रिटेशन ज़ोन |
| अवधि | लगभग 3 घंटे | 1 घंटे से कम |
| वाहन | खुली जिप्सी, 6 आगंतुकों तक | वन विभाग की बस, या जिप्सी |
| शेर दिखना | अक्सर, पर कभी पक्का नहीं | बहुत संभव |
| दूसरे वन्यजीव | तेंदुआ (दुर्लभ), हिरण, मृग, मगरमच्छ, 300+ पक्षी | बाड़े में तेंदुआ, हिरण, मृग |
| बंद | लगभग 16 जून–15 अक्टूबर | आम तौर पर बुधवार; मानसून की व्यवस्था जाँचें |
| किसके लिए सबसे अच्छा | असली जंगल का अनुभव | परिवार, कम दिन, पक्का दर्शन |
गिर राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य गिर जंगल ट्रेल
जंगली शेरों के इलाक़े में खुली जीप की सफ़ारी
असली आकर्षण: सासण में आवंटित जंगल के रूट पर खुली जिप्सी में क़रीब तीन घंटे की ड्राइव, साथ में वन विभाग का गाइड — अभयारण्य के पर्यटन ज़ोन से होकर, जहाँ एशियाई शेर, तेंदुए, हिरण और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षी खुले में रहते हैं। प्रवेश सिर्फ़ आधिकारिक ई-परमिट से।
गिर राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य देवळिया सफ़ारी पार्क
गिर इंटरप्रिटेशन ज़ोन — छोटी सैर, शेर दिखना लगभग तय
सासण से क़रीब 12 किमी पश्चिम में गिर जैसे ही प्राकृतिक परिवेश का एक बड़ा बाड़बंद इलाक़ा, जहाँ बस या जिप्सी के छोटे चक्कर में शेर, तेंदुए और शाकाहारी जानवर देखे जा सकते हैं। जंगल ट्रेल के परमिट ख़त्म हों तो यही सहारा है, और छोटे बच्चों के साथ अच्छा विकल्प।
गिर राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य
सोमनाथ, दीव और सौराष्ट्र का तट सोमनाथ मंदिर
अरब सागर के किनारे पहला ज्योतिर्लिंग
भारत के सबसे पवित्र शिव मंदिरों में से एक, बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाने वाला; कई बार ध्वस्त और पुनर्निर्मित हुए स्थल पर आज़ादी के बाद फिर से बना। सासण से क़रीब एक घंटे की दूरी पर, गिर सफ़ारी का स्वाभाविक जोड़ीदार।
हमारी सलाह है कि दोनों कीजिए: जिस दोपहर पहुँचें उस दिन देवळिया, और अगले एक-दो दिनों में जंगल ट्रेल की दो ड्राइव। एक दूसरा सफ़ारी पार्क, आंबरडी, भी है — पूर्वी हिस्से में धारी के पास।
शेर
एशियाई शेर अपने अफ़्रीकी रिश्तेदारों से थोड़े छोटे होते हैं। नरों का अयाल छोटा और कम घना होता है जिससे कान दिखते रहते हैं, और नर-मादा दोनों में आम तौर पर पेट के साथ-साथ त्वचा की एक लंबी तह दिखती है। झुंड भी छोटे होते हैं, और नर व मादा अक्सर अलग रहते हैं, सिवाय प्रजनन के समय या बड़े शिकार पर। ये मुख्यतः चीतल, साँभर, नीलगाय और जंगली सूअर खाते हैं — और मवेशी भी, जो साथ रहने वाले लोगों से इनके असहज पर अद्भुत रूप से सहनशील रिश्ते के केंद्र में है।
दिन की गर्मी में शेर वही करते हैं जो सारी बिल्लियाँ करती हैं — सोते हैं, आम तौर पर किसी रास्ते या सूखे नाले के किनारे छाँव में। दिन के उजाले के पहले और आख़िरी घंटे में वे चलते, दहाड़ते और पानी पीते हैं।
दूसरे वन्यजीव
- तेंदुए गिर में बहुत हैं पर कम ही दिखते हैं; साँझ का समय और पथरीला या नदी किनारे का इलाक़ा सबसे अच्छा मौक़ा देते हैं।
- हिरण और मृग: बड़े झुंडों में चीतल, साँभर, नीलगाय, छोटा चौसिंगा और खुली झाड़ियों में चिंकारा।
- मगरमच्छ कमलेश्वर बाँध पर और नदियों के किनारे; गिर में दशकों से इनका प्रजनन कर इन्हें छोड़ा जाता रहा है।
- छोटे शिकारी: धारीदार लकड़बग्घा, सुनहरा सियार, जंगली बिल्ली, नन्ही रस्टी-स्पॉटेड कैट, नेवले और बिज्जू (हनी बैजर) — ज़्यादातर रात में सक्रिय।
- पक्षी: 300 से ज़्यादा प्रजातियाँ, जिनमें क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल, चेंजेबल हॉक-ईगल, बारिश में नवरंग (इंडियन पिट्टा), दूधराज, जाँघिल, उल्लू, गिद्ध और अनगिनत मोर शामिल हैं।
जंगल
गिर पश्चिमी भारत में बचा सूखे पर्णपाती वन का सबसे बड़ा हिस्सा है। पश्चिमी आधे में सागौन का दबदबा है; बाक़ी जगह यह बबूल और बेर की झाड़ियों, शुरुआती वसंत में नारंगी दहकते पलाश, और नदियों के किनारे सदाबहार जामुन, करंज और बरगद की पट्टियों को जगह देता है। सात नदियाँ इन पहाड़ियों में निकलती या इनसे गुज़रती हैं, जिनमें हिरण, शेत्रुंजी, मच्छुंद्री और शिंगोडा हैं, और इन पर बने जलाशय सूखे मौसम में जंगल की जीवनरेखा हैं।
गिर के लोग
मालधारी
मालधारी पशुपालक हैं — नाम का मतलब ही है “माल (पशुधन) रखने वाले” — जो पीढ़ियों से गिर के जंगल में नेस कहलाने वाली काँटों की बाड़ वाली बस्तियों में रहते आए हैं, भैंसें और गायें चराते और दूध-घी बेचते हुए। शेर उनके जानवर ले जाते हैं और वे इसे उस धीरज से सहते हैं जो मशहूर हो चुका है। 1970 के दशक से कई परिवारों को राष्ट्रीय उद्यान से बाहर बसाया गया; बाक़ी अभयारण्य में ही हैं। अगर आपका रूट किसी नेस के पास से गुज़रे तो याद रखिए कि वह किसी का घर है।
सिद्दी
गिर के आसपास, ख़ासकर तालाला के पास जांबुर गाँव में, सिद्दी रहते हैं: पूर्वी अफ़्रीकी मूल के गुजराती, जिनके पुरखे सदियों पहले नाविकों, सैनिकों और इलाक़े के शासकों के सेवकों के रूप में आए थे। वे संत बावा गोर के भक्त हैं, और उनका धमाल — मोरपंख और रँगे चेहरों के साथ किया जाने वाला तेज़, ताल-प्रधान नृत्य — वह सांस्कृतिक प्रस्तुति है जो सासण आने वाले ज़्यादातर लोग देखते हैं। अगर आप इसे देखें तो ऐसा शो चुनिए जिसमें मंडली को वाजिब मेहनताना मिलता हो।
शेर कैसे बचाए गए
उन्नीसवीं सदी के आख़िर तक शिकार ने एशियाई शेर को उसके लगभग पूरे इलाक़े से मिटा दिया था। जो बचे वे गिर तक सिमट गए थे — जूनागढ़ के नवाबों की निजी शिकारगाह; 1900 के आसपास उनकी संख्या के अनुमान बहुत अलग-अलग हैं और शायद ज़रूरत से कम थे, पर वह यक़ीनन एक बचा-खुचा अवशेष ही था। वायसराय लॉर्ड कर्ज़न के प्रोत्साहन से — जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपना शेर का शिकार रद्द कर दिया था — नवाबों ने शिकार पर पाबंदी लगाई और फिर उसे लगभग ख़त्म ही कर दिया।
आज़ादी के बाद गिर को 1965 में वन्यजीव अभयारण्य और उसके केंद्र को 1975 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। संरक्षण, कुछ गाँवों के पुनर्वास और वन विभाग व स्थानीय लोगों के दशकों के काम ने बाक़ी कर दिखाया। हाल की हर गिनती में आबादी बढ़ी है, और अब शेर पुरानी सीमाओं से बहुत आगे रहते हैं — खेतों में, तटीय झाड़ियों में और क़स्बों के आसपास। यह कामयाबी नई मुश्किलें भी लाती है: खुले कुएँ, सड़कें और रेल लाइनें जो शेरों की जान लेती हैं, और यह जोखिम कि किसी एक बीमारी का प्रकोप एक ही इलाक़े में सिमटी आबादी पर टूट पड़े।
नमूना यात्रा-क्रम
दो रातें: ज़रूरी चीज़ें
- दिन 1: दोपहर ढलने से पहले सासण पहुँचिए; देवळिया सफ़ारी पार्क; ओरिएंटेशन केंद्र।
- दिन 2: सुबह जंगल ट्रेल; दोपहर और शाम आरती व समुद्र-किनारे के लिए सोमनाथ में।
- दिन 3: सुबह दूसरी जंगल ट्रेल; प्रस्थान।
पाँच दिन: शेर, मंदिर और समुद्र
- दिन 1: जूनागढ़ पहुँचिए; महाबत मक़बरा और उपरकोट।
- दिन 2: रोपवे से या भोर में सीढ़ियों से गिरनार; सासण की ड्राइव।
- दिन 3: सुबह और दोपहर जंगल ट्रेल की ड्राइव।
- दिन 4: तड़के देवळिया; सोमनाथ; आगे दीव।
- दिन 5: दीव का क़िला, गिरजाघर और समुद्र-तट।
क्या पहनें और क्या लाएँ
- रंग: ख़ाकी, जैतूनी, भूरा या स्लेटी। सफ़ेद, लाल और हर चटख रंग से बचिए।
- सर्दी (नवंबर–फ़रवरी): खुली जीप में सुबहें सचमुच ठंडी होती हैं — फ़्लीस या जैकेट, टोपी और दस्ताने तक। देर सुबह तक जल्दी गर्मी हो जाती है, इसलिए परतों में कपड़े पहनिए।
- गर्मी (मार्च–जून): पूरी बाँह के हल्के सूती कपड़े, चौड़े किनारे की टोपी, धूप का चश्मा, सनस्क्रीन और ढेर सारा पानी।
- हमेशा: बंद जूते, धूल के लिए स्कार्फ़ या बफ़, दूरबीन, आपका परमिट और मूल फ़ोटो पहचान-पत्र।
- छोड़कर आइए: परफ़्यूम, प्लास्टिक की थैलियाँ, जंगल में खाने का सामान, और ड्रोन — जिनकी अनुमति नहीं है।
फ़ोटोग्राफ़ी, तमीज़ के साथ
- 200–400 मिमी का लेंस ज़्यादातर हालात के लिए ठीक है; शेर अक्सर पास होते हैं, पक्षी नहीं।
- ड्राइवर से कभी ट्रैक छोड़ने, किसी जानवर का रास्ता काटने या गाइड की सलाह से ज़्यादा पास सरकने को मत कहिए।
- फ़्लैश नहीं, जानवर का सिर उठवाने के लिए पुकारना या सीटी बजाना नहीं, और पक्षियों की आवाज़ें बजाना नहीं।
- वाहन के भीतर बैठे रहिए। उतरना मना है, सिवाय वहाँ जहाँ गाइड कहे।
- “रूट से हटकर” शेर दिखाने के लिए पैसे मत दीजिए। अवैध रूप से रचे गए दर्शन जानवरों को नुक़सान पहुँचाते हैं और इन पर मुक़दमा चलता है।
- मालधारी या सिद्दी लोगों की तस्वीर लेने से पहले पूछिए, और इनकार को शालीनता से स्वीकार कीजिए।
- उद्यान के बाहर शेरों की सटीक जगहें सोशल मीडिया पर डालने से पहले सोचिए।
पैसे, नेटवर्क और सुरक्षा
- गाइड, टिप और छोटी दुकानों के लिए नक़द रखिए; बड़े होटलों में कार्ड और डिजिटल भुगतान चलते हैं।
- गुजरात में शराबबंदी है: सासण में शराब नहीं बिकती। केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते दीव अपवाद है।
- खाना लगभग पूरी तरह शाकाहारी है और अक्सर बेहतरीन — काठियावाड़ी थाली ज़रूर आज़माइए।
- मोबाइल नेटवर्क सासण गाँव में ठीक-ठाक और जंगल के भीतर कमज़ोर है।
- साँझ के समय या अँधेरे के बाद जंगल की सड़कों पर कभी पैदल मत चलिए, और उद्यान की सीमा पर बने लॉज में बच्चों को पास रखिए।
तारीख़ें चुनने को तैयार हैं? देखिए कब जाएँ, कैसे पहुँचें और कहाँ ठहरें।
यात्रा में और जोड़ें
गुजरात की दूसरी बड़ी यात्रा दूर उत्तर में, कच्छ में है। हमारी धोलावीरा गाइड कच्छ के बड़े रण में खड़ीर बेट द्वीप पर बसे हड़प्पाकालीन नगर के बारे में बताती है, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। सासण से यह सड़क मार्ग से लगभग 400–450 किमी दूर है, आमतौर पर राजकोट होकर, इसलिए कच्छ को साइड-ट्रिप न मानकर कम से कम दो रातें अलग से दीजिए।
आगे राजस्थान जा रहे हैं? पुष्कर का रेलवे स्टेशन अजमेर जंक्शन अहमदाबाद से दिल्ली की ओर जाने वाली मुख्य लाइन पर है, इसलिए झील किनारे बसा यह तीर्थ-नगर गुजरात और राजस्थान की लंबी यात्रा में आसानी से जुड़ जाता है। हमारी पुष्कर ट्रैवल गाइड (अंग्रेज़ी में) घाटों, ब्रह्मा मंदिर और नवंबर के ऊँट मेले की जानकारी देती है।
